शुक्रवार, नवंबर 03, 2017

रविवार, जुलाई 23, 2017

Jag da- A memoir

July 22, 2017.
WhatsApp blipped with a message from Prof Tripathi that Jag Da is no more.  It was a shock as there was no news that he was sick. I have not met him since last 2 years due to extraordinary business. Dr. Jagdish Chandra Joshi was popularly known as Jagda in whole NainiTal-Almora area. He was a teacher-researcher in DSB college, Physics department.  He also carried out a big job of Warden ship of a big hostel of DSB college for long many years.

A fantastic experimentalist 

I was almost a second generation students of Jagda.  He retired a few years later I completed my M.Sc.  For instance had told us the alternate way of aligning a telescope in the 'angle of prism' experiment when I was completing my B.Sc. in 1983 in DSB College Nainital.  The  procedure explained in books had no connection with what he was explaining.  While viewing with his eye and keeping his big cheek on the instrument he tilted the whole spectrometer to focus at the window a bit far... Thats the way I have also been teaching it to B.Tech. students since last 20 years, and one can very well imagine how deep the impact of his teaching was (and How often I remembered him). Molecular Spectroscopy  Lab (now Photophysics lab) of NainiTal has several  instruments designed during his time.

Democracy in the hostel
Ask any one who had lived in Brook Hill Hostel- if he ever spoke roughly to any one.  He knew the attitude of the youngsters and knew very well how to manage a hostel like Brook Hill!   Later when I became the warden of an undergraduate hostel, I understood the difficulties and the responsibilities of Jag da during those days.


May the soul rest in peace.

Prem



गुरुवार, अप्रैल 06, 2017

निमित्त मात्रं


 आजकल अक्सर इस श्लोक की अंतिम पंक्ति याद आ जाती है.  इसलिए नहीं कि भगवान श्रीकृष्ण ये कहते हैं.अर्जुन से कि करने वाला मैं हूँ.तू खड़ा हो जा बस . बल्कि इसलिए, कि सारा कार्य तो मिल-बैठ के सबकी मदद  से होना है -- कर्ता  तो निमित्त मात्र के लिए है।

श्रीमद्भागवत गीता : अद्ध्याय ११ , श्लोक ३३:

तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व
जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम्।
मयैवैते निहताः पूर्वमेव
निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्।।11.33।।

अक्सर "भयावह" स्थितियों में  शायद संस्कृत के श्लोक याद आते हैं.


अप्रेल ६, २०१७


रविवार, सितंबर 04, 2016

Light fedility or LI FI लाइट फेडिलिटी यानि लाईफाई

लाइट फेडिलिटी  यानि  लाईफाई (Li-Fi)

हाई फाई, वाई फाई  और अब लाईफाई
 लाईफाई-  ठीक  हाई फाई (hi-fi)  या वाई फाई (wi-fi or wireless fidelity) की तर्ज पर दिया गया नाम है. इसका सीधा सम्बन्ध  इन्टरनेट से है.   लाईफाई प्रकाश के इस्तेमाल से बनी इंटरनेट की एक नई तकनीक  नाम है।  इसका उपयोग इन्टरनेट के डाटा को लाने ले जाने के लिए किया जा रहा है- ठीक वैसे ही जैसे कि  वाई -फाई  राउटर करता है.

  एक पंथ  दो काज
आपको याद होगा कि  भारत में भी जनता को मुफ्त इन्टरनेट सेवा देने की बातें चलती रहती हैं.  फर्ज कीजिये कि सरकार गाँव -गलियों में लाइट  के लिए बल्ब लगा दे (ये बल्ब आधुनिक LED - हो सकते हैं) और -बिलकुल -  " एक पंथ  दो काज " वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए, उन्हीं बल्बों से इन्टरनेट का आदान प्रदान भी हो. आप इसे 'एक तीर से दो निशाने' भी कह सकते हैं.

प्राचार्य हेराल्ड हास 
 एडनबरा  विश्वविद्यालय के प्राचार्य हेराल्ड हास ये बताते हैं. उन्होंने एक  TED TALK भी इस सम्बन्ध में  दिया है. उन्होंने ये बताया कि  इन्टरानुसरित परिवर्तित किये गया  एक  LED बल्ब - "राऊटर " का काम करता है।  ये LED बल्ब एक यन्त्र से जुड़ा रहता है- जो कि इन्टरनेट से जुड़ा रहता है. इंटरनेट डाटा-इस यन्त्र के माध्यम से बल्ब में जाते हैं. 
 बल्ब का प्रकाश जहाँ -जहाँ पहुच पता है- वहां तक इन्टरनेट का इस्तेमाल किया जा सकता है.  उस तरफ एक रिसीवर  (यानि) डोंगल उस प्रकाश को कंप्यूयर या मोबाइल फ़ोन तक पहुचा देता है.

संवेदनशीलता:
चूँकि  प्रकाश की आव्रत्ति १० की घात १४ होती है - यह वर्तमान में इस्तेमाल होने वाली तरंगों के १० की घात ०९ के मुकाबले कम से कम दस हजार गुना तेज होगी.  यानी  इंटनेट स्पीड काफी अच्छी.
http://www.nature.com/articles/srep18690

बस इन्तेजार कीजिये लाईफाई का.  जो कि बस   आने ही वाला है. 

प्रेम 
सितंबर ४, २०१६ 



सोमवार, अगस्त 15, 2016

चीनी कहावतें : Interesting chinese sayings

चीनी कहावतें :
साभार :  https://goo.gl/zVZPU6

१,  असहिस्णुता बड़ी बड़ी  योजनाओं का बन्टाधार कर सकती है।
२. हजारों मील लंबी यात्रा की शुरुआत एक  कदम से होती है.
३. अगर आपको झुकना ही पड़े तो कम झुको.
४. एक छोटी सी मुस्कराहट से आप के जीवन को  दस बरस मिल सकते हैं.

5. A bird does not sing because it has an answer. It sings because it has a song.

6. A book holds a house of gold.   किताब में  सोने की खान होती है.

7. Talk does not cook rice.   बोलने से (खाली बकवास करने से) खाना नहीं पकता है /
8. Experience is a comb which nature gives us when we are bald. जब हम गंजे हो जाते  हैं,  प्रकृति हमें एक अनुभव रूपी कंघी देती है।

9.Be not afraid of growing slowly, be afraid only of standing still.

10. Behave toward everyone as if receiving a guest. सबसे ऐसे व्यववहार करें, जैसे आप मेहमान से मिल रहे हैं। 
11. A fall into a ditch makes you wiser.  धोखा खाने से मनुष्य बुद्धिमान बनता है।

12. Better a diamond with a flaw than a pebble without one.  अगर हीरे में  खोट है तब भी वह एक कंकड़ से अच्छा है.
13. He who asks is a fool for five minutes, but he who does not ask remains a fool forever. प्रश्न पूछने वाला कुछ देर के लिए बुध्धू  है, लेकिन न पूछने वाला जीवन भर।

14. An inch of time is an inch of gold but you can't buy that inch of time with an inch of gold. क्षण भर  समय रत्ती भर सोने के समान है, लेकिन आप रत्ती भर सोने से क्षण भर  समय नहीं खरीद सकते.
15. A closed mind is like a closed book; just a block of wood. बन्द दिमाग एक बन्द किताब  की तरह है- ठीक एक लकड़ी के गुटके की तरह.

मजे की बात है कि पुरानी  कहावतों में  इतनी बार किताब का जिक्र आता है, समय न बर्बाद करने का, बुद्धिमानी का भी।   

शुक्रवार, जून 03, 2016

आधुनिक संचार के पितामह क्लॉड शनान

आधुनिक संचार के पितामह क्लॉड शनान (Claude Shannon)

क्लॉड शनान ने १९४८ में  गणित में  संचार का एक ऐसा आइडिया [१] दिया जिससे आजकल की डिजिटल संचार ब्यवस्था की नीव रख दी.  कई दशकों (यहाँ तक  कि मृत्यु तक ) तक उन्हें बहुत लोग नहीं जानते थे.
जैसे गुरुत्वकर्षण के नियमों के लिए न्यूटन का योगदान है- ठीक वैसे ही आधुनिक संचार में शनान का योगदान मान जाता है.

१९४० के आसपास जब टेलीफोन , टीवी , टेलीग्राम टेलेक्स आदि संचार के माध्यम अलग अलग तरह से काम करते थे , शनान ने इन सबको एक ही थाली के चट्टे - बट्टे बता कर एकाकार  कर   दिया।  उन्होंने ये भी बताया कि  इन सबका यूनिट एक बिट है।   'बिट' का इस्तेमाल शनान ने पहली बार किया था १९४८ में।  उन्होंने इनपुट 
एवं आउटपुट की सीमाओं को भी तभी तय क्र दिया।   जैसे आप यदि किसी कैमरे से फोटो का डिटेल लेना चाहें तो आप एक सीमा से आगे नहीं जा सकते.  फोटो  धुंधली हो जायेगी - इसको आप शनान सीमा कह सकते हैं. ठीक वैसे ही- आपकी इंटरनेट की स्पीड या फिर मोबाइल के सिग्नल  आदि आदि- सब शनान सीमा में  काम करते हैं.

उनकी जन्म शताब्दी (१९१६) मनायी  जा रही है।  उन्होंने संचार थ्योरी , डेटा संकलन , डिजिटल कम्प्यूटर , डेटा सुरक्ष्या , कृत्रिम बुद्धि तथा सर्कस में दिखाई जाने वाली जगलिंग  पर काम किया।

[information theory , data compression, digital computers , cryptography, and juggling, as well as laying foundations of artificial intelligence] .

एक लिंक
http://www.itsoc.org/resources/Shannon-Centenary

एक वीडियो
https://www.youtube.com/watch?v=z2Whj_nL-x8


[१]. C. E. Shannon, "A Mathematical Theory of Communication," Bell System Technical Journal, vol. 27, pp. 379–423, 623–656, 1948.

प्रेम , जून ३, २०१६

शनिवार, मई 21, 2016

Mark Twain मार्क

Quote of Mark Twain:

The following is believed to be said by Mark Twain:

"When I was a boy of 14, my father was so ignorant I could hardly stand to have the old man around. But when I got to be 21, I was astonished at how much the old man had learned in seven years." — Mark Twain

मार्क TWAIN  का  एक  तथाकथित कथन :

"जब मैं  १४ साल का था, मेरे पिताजी  बहुत सारी  बातों  से  इतने  अनजान  थे  कि  मुझे  इन बुजुर्ग  का आसपास  रहना अच्छा नहीं  लगता था।   लेकिन मैं   जब  २१ साल का हुआ  तो मुझे इतना आश्चर्य  हुआ  कि इन्होने पिछले ७ सालों में  कितना कुछ सीखा है " . - मार्क 

असल में  पिताजी  की नहीं , बच्चे की समझदारी बढ़ी तो उसे पिताजी ज्यादा जानकार लगने लगे. 

प्रेम 
२१ मई २०१६ 


बुधवार, मई 04, 2016

Role of digital technology and e-learning in societal development: Workshop at Champawat Schools

 "Role of digital technology and e-learning in societal development"

(On the occasion of workshop at Champawat Schools May 7-9, 2016)

It is well known that the Sarva Sikhsha Abhiyan (सर्व शिक्षा अभियान)  are helping to irradiate the illiteracy. However, if we talk about 75% of the students completing Masters degree,  they realise that he/ she is now not employable in any field.  This is a bitter truth of the country at the present.
Digital Technology

To understand the 'digital technology' in simple terms, we  consider the situation of 1990s (about 25 years back).  There were not many telephones. The letters (post cards, inlands, envelops) were the only way of information exchange for the 99% of the populations. In contrast, today, 99% of population have access to the telephone in some way or the other. This is -one of the advantage of digital technology to society.

Kafal (काफल) or fish:  Increasing per capita income, reducing wastage

    If we go to the forest and find a better quantity and  quality of Kafal, we can call the shopkeeper in the market to fix the rate accordingly.  Same is true for the potato rates at Haldwani, or the fish rates in the market -while catching the fish at far river/ or at deep  sea.  The rates can be fixed to help the related work force.  This way, the wastage of the product is reduced- which in turn, transforms the society for better.

Disadvantages of rumours

Such information exchange can also be used to spread rumors and create a tense situation in the society- this is a bad part of the communication society. The rules of the government and police, therefore, are required to be strengthen and implemented equally to keep the pace of the society.

E-learning, a by-product of digital technology

One of the side-lights of the digital technology is e-learning.  That is where the digital divide creeps in the societies like that of the Indian subcontinent.  We will talk about this 'digital divide' a bit later. Let us talk about the advantages.

1. Courses on TV: Some of us might remember, there used to be course material on TV -early in the mornings.

2. Similarly, institutes of prime importance like IITs and IISc have come up with National knowledge Network (KNK) http://nptel.ac.in/  by which they have made several thousands of courses freely available online.

Teacher-shortage may not be an issue any more
The advantage of this availability is that the shortage of experienced teachers can be addressed in the schools/ colleges. However, there will not be any reliable and economical access to the internet service (digital divide) as compared to big cities/ western countries.

Problems associated : The great digital-divide

Simply by keeping a PC or a tablet in a school can not transform the education. The electrification of rural areas, supply of electricity,  lack of good, economical internet services are the real problems faced by the students.  This is in contrast to the cities and affluent societies which creates this division between the poor and the rich (even with the digital technology). This is known as the 'digital-divide'.

Need of the hour:  To fill the gap of digital-divide

Hence the e-learning can help transform the society in a bumper way-as the same quality of the courses, learning material is available at the click of the mouse.  But for the students in the remote places of India (specially poor), this is a distant dream.  Hence, unless the problem of  digital divide is solved, we can not expect a big transformation except the Facebook type of recreation now and then through a few IPADs, Android phones or Tabs by some people.  This is similar as the tape recorders were shown to people by a few about 40 years back to play their recorded voice!


Prem
May 4, 2016

शनिवार, अप्रैल 30, 2016

रंजिश ही सही.. दिल हि दुखाने के लिए आ. .....रफ्ता रफ्ता वो मेरे हस्ती का सामां

मेहँदी हसन की  गायी  गजब की ग़ज़लें 
रंजिश ही सही..

१. "दिल हि  दुखाने के लिए  आ."
तू मुझसे खफा है तो  "जमाने के लिए आ" .
https://www.youtube.com/watch?v=dxv5U0F0nzw 


2. तू  जो रहे साथ मेरे ........  दुनियां को ठुकराऊं 
प्यार भरे दो शर्मीले नैन .........
https://www.youtube.com/watch?v=1DT8auA4BZI


३. तू मिला है तो ये अहसास हुआ है मुझको , ये मेरी उम्र थोड़ी है 
जिंदगी में तो सभी प्यार किया करते हैं.   [गुलाम अली भी सुन रहें हैं ]
https://www.youtube.com/watch?v=1DT8auA4BZI


४. आप तो नजदीक से नजदीकतर आते गए 
रफ्ता रफ्ता वो मेरे हस्ती का सामां हो गए। 
https://www.youtube.com/watch?v=vScBs9VsYqI

रविवार, अप्रैल 24, 2016

अब पछताए क्या होत है जब चिड़िया चुग गई खेत. Procrastination- a notorious tendency of modern times

अब पछताए क्या होत है जब चिड़िया चुग गई खेत. 

एक अंतर्देसी और डॉट पेन
ये मुहावरा मेरे भैया ने एक अंतर्देसी पत्र  में  लिख कर भेज  था, जब में चम्पावत के खेत खलिहानों से ज्यादा वाकिफ था.  मुहावरा झट से समझ में  आ गया क्योंकि खेत में फसल भी होती थी, और चिड़िया - तो एक से एक.   आज के जमाने में  जब बच्चे या बड़े लोग  'bird watching' को बड़ा मह्त्व देते हैं , तो क्या कहूं -कुछ कहना ही नहीं आता.  खैर. भइया का मतलब कुछ ये था कि समय नष्ट नहीं करना चाहिए.. पढ़ना चाहिए.  मेरी समझ से ये भी बाहर था कि में समय कब बर्बाद करता हूँ , (जैसे आजकल मराठवाड़ा के सूखे में बच्चे घर के लिए पानी का जुगाड़ कर  रहे हैं - तो ये कहाँ का समय बर्बाद हुआ ?).                                   

प्रोक्रस्टीनेसन  (procrastination) यानि टालमटोल या स्थगन (प्रस्ताव)!

प्रोक्रस्टीनशन  के बारे में जानना इसलिए भी जरूरी है , क्योंकि हम सब इसके शिकार हैं.  सवाल ये  है कि,  कौन कितना ?  या फिर ये, कि  इससे होने वाले नुक्सान को कैसे कम-से-कम किया जाय.


अंतिम तारीख - एक सबसे बढ़िया उदाहरण 
नीचे दिए  लिंक में  एक बड़ी पत्रिका में एक सूत्र भी दे या गया है :  साधारण सी बात है - जैसे हमें अपने एक पाइप की मरम्म्त करवानी है- जो कि थोड़ा लीक कर रहा है. अब हम अगले दस दिन  का समय तय करते हैं कि इतने दिनों में ये करा लेंगे. ।    हमने अनुमान इन दस दिनों का लगाया  क्योंकि हमें मालूम है कि (१). किसी प्लंबर से बात करनी है (२), उसे पाइप दिखाने लाना होगा  (३). उसके बताये अनुसार कुछ सामान लाना होगा. आदि आदि।

http://scitation.aip.org/content/aip/magazine/physicstoday/article/69/2/10.1063/PT.3.3064

क्षणिक सन्तुष्टि बंदर " या "instant gratification monkey"

"क्षणिक सन्तुष्टि बंदर " या
"instant gratification monkey", ये चुलबुली चीज
हर समय आपसे थोड़ी सी मस्ती
 की गुजारिश करती है. 
सामान्यतया ये मान के चलते हैं कि हम सब विवेकपूर्ण लोग हैं.  यानि सभी कामों को तर्कसंगत ढंग से करते हैं. लेकिन , यदि कोई (हम या आप) टाल -मटोल कर ने वाले  व्यक्ति हैं, तो प्रायः हम देखेंगे कि हमारे  पहले ६-७ दिन ऐसे ही निकल जाएंगे. क्योंकि  जब भी कभी समय मिलेगा, हम उसे किसी ऐसी ही चीज में  लगा देंगे, जिससे
तात्कालिक सन्तुष्टि प्राप्त हो रही होगी. (इसे कहीं कहीं पर "क्षणिक सन्तुष्टि बंदर " या "instant gratification monkey" के नाम से जाना जाता है. [Tim Urban].


हड़बड़ी -राक्षस   (Panic Monster)
हड़बड़ी -राक्षस  
(Panic Monster). ये महाशय
सिर्फ अंतिम समय में सक्रिय होते हैं.-
"बिलकुल समय नहीं बचा -कुछ
नहीं किया "

 आठवें या नौवें दिन आप देखेंगे कि या तो पाइप ज्यादा लीक होने लगा , या फिर इतवार आ गया या ऐसे ही कुछ और. अब आप को ऐसा लगेगा कि ये काम तो एकदम करना है। .  यानि अभी तक पछले ७ दिनों सी आप इस काम के लिए टाल - मटोल कर रहे  थे.  अब ये जो नौवें या दसवें दिन जो आपको ज्ञान मिला है -उससे आप एड़ी -चोटी का जोर लगाकर पाइप ठीक करवा लेंगे.  या तो कुछ पैसे ज्यादा खर्च होंगे या फिर पाइप की रिपेयर उतनी बढ़िया नहीं हुई। .  ये जो नौवें या दसवें दिन की आपकी गतिविधि थी उसे टिम अर्बन "हड़बड़ी राक्षस"  का नाम देते हैं . जो भी हुआ - काम हो गया - चाहे जैसा भी हअा.

अंतिम तिथि के  अभाव  का प्रभाव (Effect of NO LAST DATE) 

   जब तक आपके पास किसी काम के लिए अंतिम तिथि है , उसमें वो लोग जो  टा-मटोल नहीं करते , वो  तो काम को  ठीक से करेंगे ही.  अपने "टेड टॉक" में "टिम अर्बन" एक गजब की बात कहते हैं. ..... टाल मटोल करने वाले लोग भी जैसे -तैसे , जरा अपने स्तर से निचले स्तर का काम कर ही  डालेंगे -इसका एक ही कारण है - "हड़बड़ी -राक्षस"  का ठीक समय पर  (यानि अंतिम तिथि से पहले ) प्रभावी हो जाना.   
विवेकपूर्ण व्यक्ति (बांये), क्षणिक सन्तुष्टि बंदर " (बीच में )
हर समय अपना प्रभाव जमाने की कोशिश में

और हड़बड़ी -राक्षस (दाएं ) अंतिम तिथि में सक्रिय
मुश्किल तब होती है- जब किसी काम को पूरा करने की कोई समय - सीमा नहीं होती.  उस समय आपके उपर  ये "हड़बड़ी -राक्षस"  काम नहीं करता है. इसलिए आप "टालमटोल के उच्च्तम स्तर" को प्राप्त कर  लेते हैं.  इसे ही प्रोक्रस्टीनेसन (procrastination) कहा जाता है. 

सबसे ज्यादा प्रभावित लोग

टालमटोल एक ऐसा राक्षस है, जो हर एक के पीछे है. इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हैं, (१). रिसर्च स्कॉलर, प्रोजेक्ट छात्र , (२) स्कूल के बच्चे , (३) स्व-रोजगार वाले लोग या (४). नयी नौकरी वाले लोग- जिन्हें बहुत  से काम एक साथ करने पड़ते हैं।  
शोध प्रपत्र लिखना, या छोटी-मोटी रिपोर्ट बनाना , या किसी एजेंसी को नई योजना का डॉक्यूमेंट तैयार करना-  ये सब ऐसे काम हैं , जो एक दिन में नहीं होते. इनमें से कइयों की कोई अंतिम तिथि नहीं होती , यानि इन्हें अगले कई सालों (जैसे शोध  छात्र के पास प्राय: ५ साल का समय होता है).

इसी तरह से कोई स्व रोजगार करता है, तो उसके पास भी कोई समय सीमा नहीं।


बस  समझ लीजिये -यहाँ पर टालमटोल विधा का कौन सा अंग नहीं है?  - "हड़बड़ी -राक्षस"!   इसलिए ये लोग सबसे ज्यादा प्रभवित होते हैं.  

जरुरत है कि टालमटोल (procrastination)  से जितना संभव हो दूर ही रहा जाय.   इसके लिए अपने "टेड टॉक" में "टिम अर्बन"  प्रत्येक से ये कहते हैं कि   आप ९० साल को ९० छोटे छोटे बिंदुओं में बाँट के देखिये।  और ये भी देखिये कि कितने बिंदु इस्तेमाल हो चुके हैं, और कितने बचे हैं? 

प्रेम , २४ अप्रैल, २०१६ 
(गोहाटी में लेख पूरा करते हुए)




रविवार, फ़रवरी 14, 2016

गुरुत्वाकर्षण तरंग खोजी यन्त्र The instrument for observing Gravitational waves

गुरुत्वाकर्षण तरंग खोजी यन्त्र
( ग्रेविटेशनल वेव्स खोजी यन्त्र ) लीगो (LIGO, VIRGO  LIGO -INDIA).

Ripples in  space-time स्थान -समय (ब्रह्माण्ड में ) की एक प्रकार से लहराती चुन्नट-तरगें

कई दशकों की लम्बी प्रतीक्ष्या के बाद अन्तत: भौतिकविदों  ने  ripples in  space-time
यानि ये कहा जाय कि स्थान -समय (ब्रह्माण्ड में ) की एक प्रकार से लहराती चुन्नटों का पता लगा ही लिया.  इन चुन्नटों या तरंगों को गुरुत्वाकर्षण तरंग कहा जाता है।

 काले तारा -युग्म के एकाकार हो जाने की घटना या ब्रह्माण्ड के बड़े विस्फोट 

ये तरंगें बड़े-बड़े तारों  (massive stars) के भयंकर घटनाक्रमों जैसे विस्फोटों या काले तारा -युग्म  (binary black holes) के एकाकार हो जाने पर निकलती हैं.  ये न्यूट्रॉन तारों (Neutron stars) के एक हो  जाने पर भी निकलती हैं.   काले तारों के एक होने पर सिर्फ  गुरुत्वाकर्षण तरंगें  निकलती हैं , जबकि न्यूट्रॉन तारों के एक होने पर इनके साथ गामा किरणें भी निकलती हैं.  इनका प्रयोगात्मक सत्यापन खगोल भौतिकी   मैं एक नये युग की घोषणा करता है- कि गुरुत्वाकर्षण तरंगों से हम अन्तरिक्ष को सुन सकते हैं.

फोटोन 
याद रहे आज तक,  सिर्फ प्रकाश से ही हम अंतरिक्ष के बारे में जान सकते   थे! प्रकाश यानि इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंग जिसका कण फोटोन होता है , चाहे वह गामा किरण हो , पराबैगनी या फिर रेडियो आवृत्ति का फोटोन हो.

ग्रेविटॉन
गुरुत्वाकर्षण तरंगों  सम्बन्ध ग्रेविटॉन से बनाया जाना है जो कि स्पिन २ का कण है. गुरुत्वा कर्षण  किसी
 चीज का मोहताज नहीं , यह हर उस दीवार के पार जा  सकता है -जहाँ से प्रकाश नहीं जा सकता.  इसका मतलब ये भी हुआ की 'बिग बैंग" यानि आदि ब्रह्माण्ड के वो क्षण जहाँ से प्रकाश  नहीं आ सकता था, के बारे में अब पढ़ा जा सकता है.

रबड़ की चादर के ऊपर एक भारी गेंद
 करीब सौ साल पहले  आइंस्टीन ने गुरुत्वाकर्षण के बारे में ये सिद्धांत दिया था कि गुरुत्व  एक  ऐसी सपाट सतह है जो कि स्थान एवं समय  (स्पेस-टाइम) से बनी है. ज्यों ही कोई भारी द्रयव्यमान  (१०-२० सूरजों  के द्रयव्यमान के बराबर)  इसके संपर्क में  आता है, या भ्रमण करता है, तो ये सतह उसके हिसाब से बाहर की तरफ मुड़  जाती है. ठीक वैसे ही जैसे एक रबड़ की चादर के ऊपर एक भारी गेंद डालने पर चादर । और जब भारी तारे जबरदस्त चाल से घूमते हुए एक दूसरे से टकराते हैं- और एकाकार हो जाते हैं (एक सिमटी गुठली बन जाते हैं ) , तो उन दोनों के द्रयव्यमान का कुछ भाग  इन तरंगों और किरणों में  तब्दील हो जाता है.



१००० से ज्यादा लेखक और १०० से ज्यादा संस्थान , भारतीय भी


  यह खोज ११ फ़रवरी २०१६ के फिजिकल रिव्यु लेटर्स (http://journals.aps.org/prl/pdf/10.1103/PhysRevLett.116.061102)  में जब प्रकाशित हुई , तो दुनियां भर में सुखद खलबली मच गई।  वह इसलिए क्यों कि इस दिशा में कई वर्षों से महंगे प्रयास  थे , ठीक वैसे ही, जैसे हिग्ग के बोसॉन के लिए किये गए थे. यहाँ पर ये बताना जरुरी है कि आधुनिक शोध की दिशा को काफी सोच विचार के बाद तय किया जाता है - हालाँकि यूरेका क्षण की प्रतीक्ष्या सभी को होती है. इस शोध पत्र में १००४ वैज्ञानिकों ने योगदान किया है, जिसमें भारत के कई संस्थानों के वैज्ञानिक हैं. यह एक और  सुखद बात है।    इस शोध पात्र की प्रस्तावना से कुछ वाक्य ये हैं: "Albert Einstein predicted existence of gravitational waves. He found that the linearized weak-field equations had wave solutions: transverse waves of spatial strain that travel at the speed of light, generated by time variations of the mass quadrupole moment of the source" .

इसी तरह से अगस्त २०१७ में दो  न्यूट्रॉन तारों  (२-३ सूरजों के द्रयव्यमान) के एक होने की घटना भी वैज्ञानिकों ने LIGO से रिकॉर्ड की है.
https://doi.org/10.1103/PhysRevLett.119.161101
http://science.sciencemag.org/content/early/2017/10/16/science.aaq0049.full


ऊपर दिखाया गया चित्र  इस (https://doi.org/10.1103/PhysRevLett.119.161101) शोध पत्र से लिया गया है. आप देकह सकते हैं कि करीब -करीब ५० हर्ज़ से निकलता एक पीला वक्र  कर्रीब दो सौ हर्ज़ के आसपास जा कर  दिखता है. ये उसी गुरुत्वाकर्सण किरण का रिकार्ड है.  लेकिन एक पीली रोड (हाईवे) जैसा काफी तीव्रता वाला प्रकाश जो की ऊपरी अक्ष में  करीब -१ सेकंड  के पास दिखती है- एक प्रकार की noise है.   जो कि नीचे दिए फोटो से साफ़ कर  दी गयी है.  क्योंकि ये पीली रोड अक्सर-बिना बताये आ जाती थी (और भाइयों को- क्यों आती है- ये पक्का पता नहीं है) , इसलिए हटाई गई है! .