मिले न फूल तो कांटों से दोस्ती कर ली
https://www.youtube.com/watch?v=7xIfJdD4AIU
बहुत साल पहले (करीब सन १९७५ के आसपास) की बात है , चम्पावत में एक साईकिल सवार आया (उसके कुछ एक साथी भी आये), उसने "गौरल चौड़ " में करीब २५ मीटर के circle में , cycle चलानी शुरू की.
[चम्पावत, जिसका जिक्र इस ब्लॉग के टाइटल मैं भी है, एक छोटा सा पहाड़ी क़स्बा था. साईकिल के नाम पर इक्का दुक्का कभी कभार दिख जाती तो बड़ा अच्छा लगता। साइकिल का स्कोप भी नहीं था, क्यूँ कि चढ़ाई, उतराई में , वह भी सिर्फ एक सड़क. उस समय चम्पावत अल्मोड़ा जिले से छिटक कर पिथौरागढ़ जिले में आया था. चम्पावत उन दिनों बहुत खूबसूरत हुआ करता था, बिजली भी घरों में नहीं थी, हमारे घर में १९७९ में आई, जब मैं हाई स्कूल के एग्जाम की तयारी कर रहा था. - वो बात दीगर है कि मेरी कमीज बिजली के बल्ब से जल गयी थी। आज यानी पिछले करीब २० सालों से चम्पावत स्वयं भी जिला बन चुका है. ]
तो बात साइकिल सवार की हो रही थी. हम सभी ने पहले दिन देखा। उसके बाद तीसरे दिन, हमारे प्रिंसिपिल साब पूरे हाई स्कूल के बच्चों को लेके गोरल चौड़ गए. हमें कॉलेज से थोड़ा उतर के सिर्फ एक छोटी से पानी की गडेरी को पार करके ऊपर चढ़ना होता था. हम अक्सर गोरल चौड़ जाते थे , जैसे खेल कूद के बड़े प्रोग्राम के लिए.
गोरल चौड़ has got its own importance in Kumaon. That story some other time.
उस दिन तो माहौल ही गजब था. जब पूरे घंटे हो गए और साइकिल सवार अंतिम कुछ चक्कर मैं साईकिल चला रहे थे, तो लाउड स्पीकर पर ये ही गण बज रहा था और वह उसे lipsing कर रहे थे. मिले न फूल तो कांटों से दोस्ती कर ली. हमारे चम्पावत तहसील के तहसीलदार, टाउन एरिया कमेटी के चेयरमैन , सदस्य, तथा ब्लॉक प्रमुख - सभी लोग आये, सबने उस साइकिल सवार का अभिवादन किया, उन्हें ढेर सारे गिफ्ट दिए. वह नौजवान हमारा , हम सबका हीरो बन चुका था. हम सब ख़ुशी ख़ुशी गर वापस आये. कई दिनों और महीनों या कहिये कि सालों तक वह दिन, और वह नौजवान, हमें याद रहा है.
कुछ सालों के बात, बड़ी अजीब सी बात हुई और हमें बहुत अटपटा लगा , और हमें बड़ी जोर का झटका लगा। हुवा यूँ कि , एक फेरी वाला जो साड़ियां बेचने गांव आया , जब साड़ियां दिखा रहा था, तो हमारी नजर उसके चेहरे पर पड़ी. हे भगवान , ये तो वही साईकिल सवार? हम तो हक्के बक्के रह गए. एक तरह से हमारा हीरो, आज फेरी वाला बन गया? हमने उनसे पूछा - वो बोले कि उसपे कुछ मिला नहीं बाद को.
आप समझ ही गए होंगे कि इस गाने से हमें ये घटना क्यों याद आयी. और ये भी
"पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब, खेलोगे कूदोगे होगे खराब"
बांकी फिर कभी.
प्रेम ( जून ९, २०२६, चम्पावत से ).